आम जनता को यह अवगत कराना आवश्यक है कि भारत को स्वतन्त्रता बिना खड्ग, बिना ढ़ाल के ना तो मिली और ना ही एयर कन्डीशन्ड कमरों में या सभागारों में बैठकर मीठी-मीठी बातों से उसकी सुरक्षा की जा रही है। भारत को स्वतन्त्रता असंख्य वीरों के बलिदानों के फलस्वरूप मिली है एवं आज भी देश के भीतर एवं देश की सीमाओं पर उसकी प्रतिदिन सुरक्षा सिपाहियों एवं सैनिकों के बलिदानों से की जा रही है। हमारा यह दायित्व है कि हम ऐसे वीरों के परिवारों, जिन्होंने देश को स्वतन्त्रता दिलाने एवं उसकी रक्षा करने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया हो समाज में विशेष सम्मान दिलवाएं एवं उनको हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराएं। ऐसे सैनिकों के परिवारों को भी उचित मान-सम्मान, संरक्षण दिलाया जाए जोकि सीमा पर विषम परिस्थितियों में रहकर भी हमारे देश की रक्षा कर रहे हैं।
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कैप्टन आर सुब्रमण्यम, कीर्ति चक्र (मरणोपरांत) का जन्म 12 अगस्त 1976 को मुंबई के गोरेगांव में हुआ था। 1997 में आईएमए, देहरादून से पास आउट हुए और उन्हें 1 पैराशूट रेजिमेंट (विशेष बल) यूनिट में शामिल किया गया । फरवरी 2000 में ऑपरेशन रक्षक के लिए श्रीनगर भेजा गया। 18 जून 2000 को कैप्टन सुब्रमण्यम उस दस्ते का नेतृत्व कर रहे थे जो कुपवाड़ा के हफरुदा जंगल में एक ऑपरेशन चला रहा था। पूरी रात चली गोलीबारी में वे अधिकांश कट्टर आतंकवादियों को मार गिराने में सफल रहे। 19 जून 2000 को दुश्मन के शवों को हटाते समय तीन बचे हुए आतंकवादियों ने उन सभी पर गोलीबारी शुरू कर दी। कैप्टन सुब्रमण्यम ने उनमें से दो को मार गिराया। इसी दौरान वे गंभीर रूप से घायल हो गए और वीरगति को प्राप्त हो गए।। कैप्टन सुब्रमण्यन को उनके असाधारण साहस, अडिग लड़ाई की भावना और सर्वोच्च बलिदान के लिए देश का दूसरे सबसे बड़े शांतिकालीन वीरता पुरस्कार "कीर्ति चक्र" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से उनकी पुण्यतिथि पर बारंबार नमन!
हवलदार सुल्तान सिंह नरवरिया,वीर चक्र (मरणोपरांत) का जन्म 19 जून 1960 को मध्य प्रदेश के भिंड जिले के पिपरी गांव में हुआ था। उन्हें राजपूताना राइफल्स रेजिमेंट की 2 राज रिफ़ बटालियन में भर्ती किया गया था। 1999 में पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सेना की सर्दियों के लिए खाली की गई चौकियों पर चुपके से कब्जा कर लिया। इसके बाद भारतीय क्षेत्रों से घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए भारतीय सेना द्वारा ऑपरेशन विजय चलाया गया। योजना के अनुसार, 2 राज राइफ़ को 13 जून 1999 को सुबह 0600 बजे तक टोलोलिंग टॉप पर कब्ज़ा करने का काम सौंपा गया था। जब बटालियन ने 12 जून 1999 को 2030 बजे हमला किया, मेजर विवेक गुप्ता अग्रणी चार्ली कंपनी की कमान संभाल रहे थे। हवलदार सुल्तान सिंह नरवरिया नंबर वन सेक्शन के सेक्शन कमांडर थे, जिन्हें प्वाइंट 4590 के एरिया रॉक पर कब्जा करने का काम सौंपा गया था। हवलदार सुल्तान सिंह ने दुश्मन के छोटे हथियारों की सटीक फायरिंग के बीच 15,000 फीट की ऊंचाई पर चढ़ाई करने की भारी बाधाओं के बावजूद आगे बढ़ना जारी रखा। हवलदार सुल्तान सिंह ने शत्रुतापूर्ण गोलीबारी का सामना करते हुए अत्यंत बहादुरी का परिचय दिया और अपना सर्वोच्च बलिदान दिया व् वीर गति को प्राप्त हो गए । युद्ध के मैदान में अपने वीरतापूर्ण कार्य के लिए हवलदार सुल्तान सिंह नरवरिया को मरणोपरांत देश का तीसरा सर्वोच्च वीरता पुरस्कार "वीर चक्र" से सेसम्मानित किया गया । स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से जयंती पर बारंबार नमन !
सिपाही विकास भारद्वाज का जन्म 19 जून 1991 को हिमाचल प्रदेश के मंडी ज़िले में हुआ था । वे 2011 में सेना की डोगरा रेजिमेंट में भर्ती हो गए । प्रशिक्षण के बाद सिपाही विकास भारद्वाज को डोगरा रेजिमेंट की 6 डोगरा में भेजा गया। 4 जून को, उनकी यूनिट के कुछ सैनिक 4 वाहनों के काफिले में मणिपुर की राजधानी इंफाल की ओर जा रही थे । जब वे चंदेल जिले को पार कर रहे थे, तो रास्ते में उग्रवादियों ने उन पर घात लगाकर हमला किया। काफिले पर उग्रवादियों द्वारा किए गए हमले की योजना एनएससीएन (के), कांगलेई यावोल कन्ना लूप (केवाईकेएल) और कांगलापाक कम्युनिस्ट पार्टी (केसीपी) के कार्यकर्ताओं के एक संयुक्त समूह द्वारा बनाई गई थी। जब सैन्य काफिला चंदेल जिले के पारालोंग गांव और चारोंग गांव के बीच के इलाके में पहुंचा तो उन्होंने बारूदी सुरंग में विस्फोट कर दिया। जिसमें 50 सैनिकों के साथ लगभग 4 वाहन शामिल थे, जो बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए और विस्फोट के कारण कई सैनिक जलकर मर गए। सिपाही विकास भारद्वाज उन 18 बहादुर सैनिकों में से एक थे जो इस भयानक हमले में वीरगति को प्राप्त हो गए। । स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की ओर से जयंती पर बारंबार नमन !
Our endeavour is to spread awareness for the forthcoming generations to learn and recognise the sacrifice made by our young officers and men of the Armed Forces and an attempt to honour them by remembering them.







